मणि मधुकर की नाट्य कला

एक और अंतरीप, अक्टूबर—दिसम्बर, 2012



 @ Dr. Krishna Jakhar डॉ. कृष्णा जाखड़


भारत में नाट्य-परंपरा वैदिक युग से चली आ रही है। भरत नाट्य-शास्त्र में ‘अमृत मंथन’ नाटक का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा संस्कृत साहित्य में उत्कृष्ट कोटि के नाटकों तक चलती रही। संस्कृत नाटक के समानांतर लोक नाट्य परम्परा भी चली आ रही थी। 
किसी भी राष्ट्र का आम जन अपने वातावरण और रुचि के अनुसार मनोरंजन के साधन ईजाद कर ही लेता है। शिक्षा से वंचित समाज में जीवन के अनुरूप हास्य-विनोदमय नाटक का सृजन होता रहा है। संस्कृत के साथ-साथ जनभाषा का भी अनेक रूपों में विकास होता रहा। इन जनभाषाओं में नाट्य के अनेक रूप मिलते हैं। इन देशी भाषाओं में शताब्दियों से जननाटकों का अभिनय होता रहा है। जैसे- बंगला में यात्रा एवं कीर्तनियां नाटक, बिहार में विदेशिया। अवधी, पूर्वी हिंदी, ब्रज एवं खड़ी बोली में रास, नौटंकी, स्वांग, भांड। राजस्थानी में रास, झूमर, ढोलामारू। गुजराती में भवाई। महाराष्ट्री में लडि़ते और तमाशा। तमिल में भी भगवतमेल आदि नाट्य रूप थे। इनमें नाटक के अन्य तत्त्व गौण रहते एवं संगीतमय वातावरण की प्रधानता रहती। इसके अलावा जाति विशेष भी अपनी रोजी के लिए विशेष स्वांग रचती, जो नाट्य का ही एक रूप होता। स्त्रियां भी सामूहिक रूप से नृत्य-गान संयुक्त अभिनय करती।
नाटकों के इसी लोक स्वरूप का विवेचन करते हुए डाॅ. दशरथ ओझा लिखते हैं- ‘‘पठित समाज के सदृश्य अपठित तथा अर्द्धपठित समाज में भी प्रतिभाशाली व्यक्ति होते रहते हैं, जो अपने समुदाय के अनुरूप जनकाव्य और जननाटक का सृजन करते रहते हैं। उनकी रचना द्वारा लक्ष-लक्ष ग्रामीण जनता दृश्य तथा श्रव्य काव्य का रसास्वादन करती है। यह परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है।’’ 
हिंदी नाटक की परंपरा का मूल स्रोत यह जननाटक ही हैं। जननाटक ने ही क्रमशः विकसित होकर साहित्यिक नाटक का रूप ग्रहण किया। इस विकास प्रक्रिया में संस्कृत तथा अन्य भाषाओं के स्रोत भी आ मिले और हिंदी नाटकों का एक उच्च कोटिय उत्कर्ष हमारे सामने हैं।
चूंकि हिंदी नाटकों का उद्भव भारतेंदु युग से माना जाता है। प्रारंभिक नाटकों में प्राणचंद चैहान कृत ‘रामायण महानाटक’, हृदयराम कृत ‘हनुमन्नाटक’, बनारसीदास कृत ‘समयसार’, गुरु गोविंदसिंह कृत ‘चंडी चरित्र’ आदि नाटकों का उल्लेख किया जाता है। इन नाटकों के पद्यबद्ध होने के कारण कुछ विद्वान इनको नाटक श्रेणी में नहीं मानते। परंतु तत्कालीन मनोवृत्ति पद्य की ओर झुकी हुई थी तथा गेय भी थी। परंतु गेय होने के कारण इनको नाटकों की श्रेणी से बाहर नहीं रखा जा सकता।
भारतेंदु ने ‘नाटक’ नामक ग्रंथ लिखकर हिंदी नाटक को एक व्यस्थित रूप देने का सफल प्रयास किया। पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, वेशभूषा, रंगमंच सज्जा आदि का विस्तृत वर्णन कर भारतेंदु ने हिंदी नाटक को गरिमामय ऊंचाई पर पहुंचाया। तब से लेकर अब तक हिंदी नाटक निरंतर प्रगति करता आ रहा है।
हिंदी नाटक-परंपरा में अनेक नाटककार हुए, जिन्होंने अपनी प्रतिभा से नाटक को नया रूप-रंग देने का प्रयास किया। उन्हीं प्रतिभाओं में से एक नाटककार का नाम इस आयोजन स्थल के क्षेत्र से भी जुड़ा है। राजस्थान के चूरू अंचल के इस भूभाग में राजगढ़ तहसील का गांव सेऊवा। वहीं वैद्य श्री भूरामल शर्मा के यहां बालक मनीराम शर्मा का 11 सितंबर, 1947 को जन्म हुआ, जोकि आगे चलकर साहित्य के क्षेत्र में मणि मधुकर के नाम से ख्यात हुआ। मणि मधुकर ने हिंदी नाटक को नए आयाम प्रदान किए। उन्होंने साहित्य के शास्त्रीय बंधनों को तोड़कर जनभाषा में आम व्यक्ति का चित्रण किया। अपने आस-पास बिखरे कथ्यों के साथ-साथ व्यवस्था की विसंगतियों को उभारने का प्रयास किया। इसीलिए कई दफा उन पर अश्लीलता का दोषारोपण भी किया गया। जो समाज में घटित हो रहा है वह अश्लील नहीं, फिर साहित्य में व्यक्त होते ही उसे क्यों नकारा जाए? यह भी मणि मधुकर के हवाले से विचारणीय प्रश्न है।
मणि मधुकर ने हिंदी साहित्य को कई नाटक दिए। नाटकों के अलावा मणि मधुकर ने पर्याप्त मात्रा में कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृतांत, संस्मरण आदि विधा को भी समृद्ध किया। मणि मधुकर ने बहुत कम उम्र में ही साहित्यिक ऊंचाइयों को छुआ है। मणि मधुकर की प्रतिभा के बाबत ख्यातनाम साहित्यकार डाॅ. आलमशाह खान लिखते हैं- ‘‘....मणि नहीं चाहकर भी नगर-बोध को कवि है पर चाहकर भी नगर-बोध का कथाकार नहीं बन सका। वह गांव-ढाणी लू-लतर का ही कथाकार है। वह लोक का नाटककार है, तो आने वाले कल का साहित्यकार है। जटिल-सरल संवेदना का धनी मणि कहानी में ऊंचा, कविता में गहरा और नाटक में समर्थ है।’’ 
मणि मधुकर का प्रथम नाटक ‘रसगंधर्व’ सन् 1975 में प्रकाशित हुआ। उल्लेखनीय है कि यह नाटक प्रकाशित होने से पहले ही मध्यप्रदेश कला परिषद द्वारा 1 दिसंबर, 1973 को मंचित भी किया जा चुका था। रसगंधर्व मराठी, कन्नड़ और बांगला में अनूदित होकर खेला गया। कई विश्विद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी लगाया गया। इस नाटक से मणि मधुकर को विशेष ख्याति प्राप्त हुई। नए प्रयोग, छोटे-छोटे संवाद, सरल शब्दावली और व्यवस्था की खामियों को उजागर करता हुआ यह नाटक उनकी कीर्ति का एक स्तंभ बन गया। इस नाटक के लिए साहित्य इतिहासकार डाॅ. रामचंद्र तिवारी लिखते हैं- ‘‘रसगंधर्व आज की राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों की अर्थहीनता और विसंगति का अहसास कराने वाला एक सर्वथा नवीन नाट्य प्रयोग है।’’  इसी नाटक के लिए टिप्पणी करते हुए गिरीश रस्तोगी ने लिखा- ‘‘उसे न मात्र एब्सर्ड नाटक कहा जा सकता है, न यथार्थवादी, न मात्र एक फैंटसी और न प्रतीकात्मक नाटक, वस्तुतः उसकी सारी विशेषता अपने उस लचीलेपन में हैं, उस समन्वित सौंदर्य और संश्लिष्ट काव्य-दृष्टि में हैं, जो उसमें पैदा होती जाती है।’’  
सिद्धनाथ कुमार रसगंधर्व नाटक के विषय में लिखते हैं- ‘‘रसगंधर्व न कथानक का नाटक है, न चरित्र का- यह तो विचारों का, विचारों से अधिक अपने युग-मानस में उमड़ती-घुमड़ती विभिन्न प्रकार की विक्षुब्ध अनुभूतियों का नाटक है।’’ 
रसगंधर्व के बाद निरंतर मणि मधुकर के नाटक प्रकाशित होते रहे। सन् 1978 में ‘बुलबुल सराय’, सन् 1978 में ही ‘दुलारी बाई’, सन् 1979 में ‘खेला पोलमपुर’, सन् 1980 में ‘इकतारे की आंख’ और इसी क्रम में छपे ‘इलायची बेगम’ तथा ‘बल्ले-बल्ले बोधि वृक्ष’ आदि नाटक मणि मधुकर की साधना के फल हैं।
नाटक ‘दुलारी बाई’ में परंपरागत संस्कारों, अंधविश्वास और रूढि़यों पर करारी चोट की गई है। ‘बुलबुल सराय’ में राजनीतिक विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है। ‘इकतारे की आंख’ में कबीर का व्यक्तित्व केंद्र में रहा है।
मणि मधुकर के नाटककार के साथ यह खुशनसीबी रही कि उस द्वारा रचित सभी नाटक मंचित हुए और प्रसिद्धि को प्राप्त हुए। मणि मधुकर के नाटकों में हमेशा नए प्रयोग हुए हैं, प्रयोगों में सफलता भी मिली। हिंदी के साथ-साथ अन्य भाषाओं में इनके नाटकों को अपनाया गया। अपने नाटकों के बारे में मणि मधुकर ने कहा- ‘‘रसगंधर्व के बाद मैंने राजस्थान के कुचामणी, सुरध्याणी आदि ख्यालों को नए धरातल पर रंग-विधान देना चाहा और ‘बुलबुल सराय’, ‘खेला पोलमपुर’ और ‘दुलारी बाई’ जैसे नाटक लिखे। मैंने देखा कि यदि सधे हुए हाथों का इस्तेमाल किया जाए तो पारसी थियेटर में भी कुछ संभावनाएं हैं- ‘दुलारी बाई’ में मैंने उसे अपनाया। नतीजा अच्छा निकला। आज ‘दुलारी बाई’ शायद हिंदी का एकमात्र आधुनिक नाटक है, जिसके पांच हजार से भी अधिक प्रदर्शन हो चुके हैं- विभिन्न भारतीय भाषाओं में।’’  
विसंगतियों को उघाड़ने के लिए, व्यवस्था का विरोध करने के लिए एक सशक्त व्यक्तित्व की दरकार होती है। मणि मधुकर ने अपने नाटकों के लिए यह स्वीकार भी किया- ‘‘मेरे तमाम नाटक व्यवस्था-विरोध और एक स्पष्ट परिवर्तन की कामना वाले नाटक हैं। जाहिर है कि सत्ता को, चाहे वह किसी भी दल की हो, ऐसा नाटककार आंख की किरकिरी लगता है। पग-पग पर इन खतरों की नियति है। किंतु यह भी सही है कि अब मेरा एक प्रशंसक वर्ग है, दर्शक वर्ग है- और उसका नैतिक समर्थन मुझे प्राप्त है।’’  मणि मधुकर ने यह समर्थन न केवल अपने नाटकों के बूते पर अपितु ‘कल्पना’, ‘अकथ’, ‘रंगयोग’, ‘प्रसंग’ आदि लोकप्रिय हिंदी पत्रिकाओं के संपादन के माध्यम से भी जुटाया।
मणि मधुकर के सारे नाटक एक विस्तृत शोध दृष्टि चाहते हैं। परंतु इस पत्र के बहाने किसी एक नाटक पर संक्षिप्त प्रकाश ही डाला जा सकता है। विषयों के विभाजन के बीच सत्ता केंद्रित लालसाओं के वर्तमान युग में मणि मधुकर कृत ‘खेला पोलमपुर’ एक सशक्त नाटक है। यह नाटक अस्सी के दशक में जितना प्रासंगिक था, उससे भी अधिक वर्तमान में प्रासंगिक जान पड़ता है। इस नाटक के महत्त्व को दर्शाते हुए डाॅ. रामचंद्र तिवारी ने लिखा है- ‘‘खेला पोलमपुर में स्वार्थलोलुप सत्ता के दिग्भ्रमित होकर विनष्ट होने की ओर संकेत किया गया है।’’ 
खेला पोलमपुर का प्रथम मंचन ‘अभियान’ संस्थान द्वारा 18 मार्च, 1975 को फाइन आर्ट्स थियेटर, नई दिल्ली में हुआ। प्रकाशित होने से पूर्व ही मंचित इस नाटक को खूब प्रसिद्धि मिली। इसके बाद यह अन्य भाषाओं में अनूदित एवं मंचित होता रहा। इस नाटक के पात्र प्रतीकात्मक हैं, जिनकी संख्या चैदह हैं। नाटक की शुरूआत मंगलाचरण से होती है। सत्ता के प्रतीक लक्खी शाह, फूलकंवर, जल्लाद और दाताराम हैं। भूत-1,2,3 अंधविश्वास, रूढि़, सनातन परंपराओं के प्रतीक हैं। जानी हिंजड़ा दासता एवं बुजदिली का प्रतीक है। जडि़या, अपने ही अंदर सिमट कर जीवन गुजार लेने वाले आमजन का प्रतीक है। समरू जाट व्यवस्था एवं सत्तालोलुपता के जाल को तोड़कर सर्वजन को उजाला दिखाने वाली क्रांति का प्रतीक है।
नाटक में एक सामान्य व्यक्ति का विचलन उभरता है। वह न तो राष्ट्रों को सीमाओं में बांटना चाहता, न व्यक्ति को धर्म एवं जातियों में बांटना चाहता। वह जीवन की गति को निर्बाध रूप से बहने देना चाहता है, मगर सत्ता उसे बांटती है, तनाव में धकेलती है, युद्ध में झोंकती है, मरने और मारने को विवश करती है। स्वार्थसिद्धि के बाद जब सत्ता आमजन को नकार देती है, भुला देती है, तब उसके दिमाग में विचलन पैदा होता है। किसी सत्ता के पक्ष में युद्ध करने के बाद लौटे हुए समरू के पास अब कुछ भी अपना या पराया नहीं है। वह सोचता है- ‘‘बोलो समरू जाट, अब तुम क्या करोगे? कहां जाओगे? ....लड़ाई खत्म हो गई। जीतने वाले जय-जयकार के साथ पहुंच गए महलों में, परकोटों में...और तुम- अंधेरे के सामने। असल में- तुम्हारे साथ यह हुआ समरू जाट, कि जिन हाथों को हल की मूठ पर होना चाहिए था, उनमें बंदूक थमा दी गयी। तुम लड़े, पता नहीं, किसके खिलाफ लड़े? खूब खून-खराबा हुआ। एक रोज अचानक सफेद झंडे लहरा उठे। किसी ने किसी से समझौता कर लिया। और तुम? दूसरे सिपाहिओं की भीड़ में अपने को धकेलते हुए लौट पड़े। यह लौटना, मुर्दे की तरह लौटना है।’’ 
पोलमपुर का शासक लक्खी शाह। उसकी पत्नी फूलकंवर। यह सत्ता के प्रतीक हैं। सत्ता बनाए रखने के लिए क्रूरता का खेल सदियों से चला आ रहा है। ‘खेला पोलमपुर’ नाटक में उसे सशक्त ढंग से व्यक्त करने का सार्थक प्रयास किया गया है। लक्खी शाह चाहता है कि उसकी सत्ता बनी रहे। वह सदियों तक जिंदा रहे। उसके राज्य में रोज एक व्यक्ति को फांसी पर चढाया जाता है और माना जाता है कि मरने वाले की उम्र लक्खी शाह को लग जाती है। सत्ता में बने रहने की यह अतृप्त वासना उससे घृणित कार्य भी करवाती है। क्रूर व्यवस्था को व्यक्त करती हुई नाटककार की पंक्तियां- ‘‘सोती है रात, जहां पर रोज/छुपाकर ताजा जख्मों को/हर सुबह/रक्त के धब्बे लेकर/जगती है।/ खूनी पंजों में ठहरी हुई जिंदगी को/राजा के बर्बर, हत्यारे मन की/आकांक्षा ठगती है!’’ 
सत्ता के भीतर-बाहर बैठे सत्तालोलुप लोग एक-दूसरे के प्रति आशंकित रहते हैं। पता नहीं कब किसका विश्वास टूटकर बिखर जाए। कौन किसके विरुद्ध षड्यंत्र रच रहा है और सत्ता मद में किसी का भी गला दबाया जा सकता है। आमजन की जिंदा लाशों पर सत्ता का यह आशंकित महल खड़ा है। विसंगतियों से घिरे इस महल की नींव में युगों से ईमानदारी और परिश्रम का रक्त दबा हुआ है। इस सत्ता जाल से छुटकारा पाने का रास्ता कहीं नजर नहीं आता। नाटककार व्यक्त करता है- ‘‘प्रजाजनों की पीठ टूटकर/नींव बन गयी/भव्य झरोखों में जाली-सी/टंगी रह गयी/एक अधूरी चाह-/बोलो, बोलो, इन मायावी कंगूरों का/जादू कैसे टूटेगा?/बाहर-भीतर, सब जगह प्रेत/कैसे कोई उनके छल से बचकर/साबूत छूटेगा?’’ 
रानी फूलकंवर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए रक्त बहता देखकर खुश होती है। राजा लक्खी शाह अपनी राजसत्ता बचाने के लिए दुश्मन शासक के सामने रानी फूलकंवर को प्रस्तुत कर देता है। दर्शक के सामने यहां आकर सवाल खड़ा होता है कि आत्मसम्मान को बेचने वाला यह राजा स्वयं कब तक बच पाएगा?
व्यवस्था के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं और जनता की समस्याओं को भी नाटककार ने बखूबी उभारा है। भूतों की तृप्ति की लालसा के लिए समरू उन्हें ऐसी जगह ले जाने को कहता है, जहां मनुष्य का कोई मूल्य नहीं। उसकी समस्याओं को जानने वाला कोई नहीं। भूत पूछते हैं कि वह जगह कहां हैं। समरू कहता है- ‘‘जैसलमेर! नौ साल से अकाल पड़ा हुआ है। चींटी-मकोड़ों की तरह लोग मर रहे हैं- प्यास से, भूख से। कोई उनकी सुध लेने वाला तक नहीं।’’ 
जहां सत्तालोलुप और सुविधाभोगी लोग रहते हों, उस राष्ट्र या समाज का भविष्य अंधकारमय है। नाटककार दीवान के मुंह से कहलवाता है- ‘‘नादानी मत करो। लक्खी शाह का हुक्म अटल है। अंधकूप ही इस मुल्क का वर्तमान और भविष्य है।’’ 
आधुनिकयुगी आवरण ओढ़े हुए लोगों पर नाटक में व्यंग्य किया गया है। जीवनभर शोषक बना रहने वाला सत्तासीन व्यक्ति महान् कहलाने के लिए अनेक हथकण्डे अपनाता है। नाटककार इन्हीं दोगले व्यक्तित्व वालों पर प्रहार करता है- ‘‘आजकल मूर्ति ही महानता की कसौटी है, मौत महारानी! चैराहे पर जिसकी मूर्ति लग जाये, वही महान्!’’ 
सत्ता की क्रूरता जब सीमाएं लांघने लगती है।  तब आमजन शोषण की चक्की में पिसता-पिसता लोहे से भी कठोर बन जाता है। उसका चिंतन जाग्रत होता है। वह जड़ता को तोड़ने के लिए उठना चाहता है। नाटककार उसी व्यक्ति की चिंता को उभारता है- ‘‘पोलमपुर का शासन था/खूंखार, क्रूर!/समरू, हां, समरू जब-तब सोचा करता था-/हम जिंदा हैं, जैसे भेड़ों के झुंड-/ऊन जितनी भी होती है शरीर पर/सब उतार ली जाती है।/जनता आंसू पीकर, अंगारे खाती है!/क्या होगा, क्या होगा आगे?/कैसे जन-रोष-राग जागे!’’ 
पीडि़त जनता का चिंतन जब प्रखर हो उठता है तब जनक्रांति होती है। सत्ता की चूलें हिल उठती हैं। दूसरों की मेहनत पर सत्तासीन शोषक एवं आभिजात्य के घमंड में बैठे लोग धराशाही हो जाते हैं- ‘‘निर्दयी शासन ने/जिनको आहत कर डाला था,/समरू था एक प्रतीक-/उन्हीं के अन्तर्मन की ज्वाला का!/जब होता है षड्यन्त्र/आदमी की बुनियादों के विरुद्ध/यह ज्वाला निर्णय लेती है,/चुनकर कोई समरू सुजान/अपनी सारी ताकत,/आवाज,/सूझ उसको दे देती है!/सत्ता बनती है मौत अगर/खुद मौत उसे खा जाती है,/बह जाते हैं सिंहासन/जब जनरोष-घोष की/धारा उमड़ी आती है।’’ 
नाटककार मणि मधुकर ने ‘खेला पोलमपुर’ में उस वर्ग को उभारा है जो खुद मेहनत में विश्वास रखता है। आशंकाओं से घिर कर निढ़ाल नहीं होता। उसे कल की चिंता है, मगर आज का अहसास भी है। नाटक ‘खेला पोलमपुर’ अपने सृजनकाल सन् 1979 में जितना महत्त्व रखता था, आज भी उतना ही कारगर है। इस नाटक को ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘दिनमान’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, बांगला ‘जुगान्तर’, मराठी ‘लोकसत्ता’ के साथ-साथ ‘स्टेट्समैन’ ने भी हाथोंहाथ लिया। ‘स्टेट्मैन’ में लिखा गया- ‘‘नाटक कभी इतिहास, कभी जनश्रुति, कभी आज के ‘समय’ का आभास देता हुआ आगे बढ़ता है। समरू का चरित्र सर्वहारा और शोषित वर्ग के चरित्र को उजागर करता है। उसका क्रोध और विरोध कहीं भी व्यक्तिगत नहीं लगता है, गायक मंडली के माध्यम से वह समूह की अभिव्यक्ति बन जाता है।’’ 
नाटक ‘खेला पोलमपुर’ मणिमधुकर के समग्र दृष्टिकोण को भी अभिव्यक्त करता है। सारभूत चारों तरफ फैली अफवाहों को नजरअंदाज कर नये सूर्य के अभिवादन को आतुर नाटक का एक पात्र कहता है- ‘‘अफवाहें फैलाने वाले परिवर्तन के विरोधी होते हैं। उनकी बातों पर ध्यान मत दो। जब घरों में, खेतों में, मेहनत-मजदूरी के धंधों में नये मोर्चे खुलंेगे तो सारी धुंध अपने-आप छंट जाएंगी। लेकिन सचेत रहना है। वर्तमान मिट्टी की सोंधी महक से और भविष्य को हरियाली के घने तंतुओं से बुनना है।’’ 
भविष्य के घने तंतुओं का निर्माण करने वाला यह नाटककार मणि मधुकर हिंदी साहित्य के नाट्य धरातल पर आज सशक्त भूमिका के साथ खड़ा है। नाट्य इतिहास के सिंहावलोकन में मणि मधुकर को प्रमुखता से भले ही नहीं लिया जाए, परंतु हमारा यह सौभाग्य है कि उन्हें गौण भी नहीं किया जा सकता। मणि मधुकर के सभी नाटक हिंदी साहित्य के इतिहास की झांकी में सुसज्जित रहेंगे। वहीं नाटक इतिहास के अवलोकन में समकालीन बने रहेंगे।

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