शताब्दी पुरुष: बाबा नागार्जुन

(जन्म-शताब्दी पर विशेष)

 @ Dr. Krishna Jakhar डॉ. कृष्णा जाखड़




साहित्य के विशाल फलक पर हिन्दी साहित्य का विस्तार उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से नए रूप में सामने आता हैं। इसी के मध्य आकार लेती हैं विभिन्न विचारधाराएं। विचारधाराओं को वाद की संज्ञा से अभिहित किया गया और हिन्दी साहित्य की धारा अविरल रूप से प्रवाहित होती आ रही है। भारतेंन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, समकालीन कविता आदि ऐसी संज्ञाएं हैं, जो साहित्य रसिकों के मन में आलोडन पैदा करती रही हैं। 
इन्हीं धाराओं के मध्य का एक दौर है प्रगतिवाद! प्रकृति के हिंडोले में झूलते हुए कवि को, यथार्थ की जमीन पर ला खड़ा करने वाला युग। एक वैचारिक आंदोलन, माक्र्सवाद से ओतप्रोत, किसान और मजदूर को केन्द्र में लिए, हिन्दी साहित्य जगत में हलचल पैदा कर देने वाला युग। 
‘‘बाबा’’ नाम से सुविख्यात, प्रगतिवाद का सशक्त स्तम्भ, जन्मना कवि, प्रकृत्या घूमक्कड़ और विचारतः माक्र्सवादी एक ऐसी शख्सियत जिन्हें नागार्जुन नाम से संपूर्णता मिली, यह वर्ष उनके जन्मशताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।
ठेठ देशी संस्कारों में निखरे हुए, अकेले कवि जो आजीवन पश्चिमी प्रभावों से बचे रहे।
30 जून, 1911 (ज्येष्ठ पूर्णिमा) को सामान्य अशिक्षित कृषक परिवार में जन्में वैद्यनाथ मिश्र। पिता गोकुल मिश्र उन्हें ‘ठक्कन’ कहकर पुकारा करते। यही ठक्कन यानी वैद्यनाथ मिश्र आगे चलकर बाबा नागार्जुन के रूप में विख्यात होते हैं। 
अभावों और पीड़ाओं में डूबे हुए बचपन को याद कर कवि नागार्जुन का हृदय बोल उठता है-

पैदा हुआ था मैं-
दीन-हीन अपठित किसी कृषक कुल में
आ रहा हूं पीता अभाव का आसव ठेठ बचपन से
कवि! मैं रूपक हूं दबी हुई दूब का
हरा हुआ नहीं कि चरने को दौड़तै !!
जीवन गुजरता प्रतिपल संघर्ष में!!
मुझको भी मिली है प्रतिभा की प्रसादी
मुझसे भी शोभित है प्रकृति का आंचल
पर न हुआ मान कभी!

कवि नागार्जुन की लगभग बीस काव्यकृतियां प्रकाशित हुईं। वहीं कथाकार नागार्जुन भी कहीं पीछे नहीं। बाबा नागार्जुन की कलम से सृजित ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बलचनमा’, ‘नई पौध’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘वरुण के बेटे’, ‘दुखमोचन’, ‘कुम्भीपाक’, ‘अभिनंदन’, ‘उग्रतारा’, ‘इमरतिया’, ‘पारो’, ‘गरीबदास’ आदि चर्चित उपन्यास हिन्दी साहित्य की थाती हैं। यात्रा-संस्मरण ‘टिहरी से नेलङ’ व आत्मकथात्मक रचना ‘आइने के सामने’ भी बाबा की प्रसिद्ध कृति है।
कविता तो मानों नागार्जुन की सहोदरा हो। उनके यायावरी जीवन के साथ कविता मदमाती नदी की तरह बहती रही। बाबा की कविता अपनी लय के उतार-चढ़ाव के साथ-साथ पाठक को बहाती है तो उससे बतियाती भी है-

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
कई दिनों तक लगी भींत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआं उठा आंगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठीं घर-भर की आंखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पांखें कई दिनों के बाद

अकाल के दौरान की उदासी और मनहूसियत तथा अकाल के बाद की उम्मीद एव खुशी का इतना सूक्ष्म और हार्दिक लोकचित्र सिर्फ नागार्जुन की कवि वाणी से ही संभव हो सकता था। 
गांव- तरउनी, जिला- दरभंगा, बिहार में श्रीमती उमा देवी की कुक्षी से उत्पन्न बालक वैद्यनाथ निष्ठुर पिता से प्रताडि़त बचपन को चीरता हुआ काव्य की झोली में आ बैठा। काव्य की अविरल धारा पूरे जीवन नागार्जुन को सींचती रही। ‘युगधारा’, ‘सतरंगे पंखोंवाली’, ‘प्यासी पथराई आंखें’, ‘तालाब की मछलियां’, ‘तुमने कहा था’, ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमनें’, ‘हजार-हजार बांहों वाली’, ‘पुरानी जूतियों का कोरस’, ‘रत्नगर्भ’, ‘ऐसे भी हम क्या ऐसे भी तुम क्या’, ‘भूल जाओ पुराने सपने’, ‘चित्रा’, ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ आदि काव्य-कृतियों ने बाबा के बहाने साहित्यकाश को नापा।
मुट्ठी-भर लोगों के हाथों सिमटी हुई सत्ता और सम्पत्ति को देखकर बाबा का हृदय हाहाकार कर उठता। जब मजदूर, किसान के बच्चे भूख मरने पर लाचार दिखे तो बाबा ने सर्वहारा की विजय का सपना पाला-

आज बंधन-मोक्ष के त्योहार का आरंभ होता है
‘उपद्रव’, ‘उत्पात’ कहकर कुबेरों का वर्ग रोता है
कर-चरण-मन-प्राण फंदों में फंसे थे-
दिशा थी अवरुद्ध, दृग पथरा रहे थे-
सर्वहारा ने निकाल है स्वयं ही मुक्ति का यह मार्ग
महाश्वेता दानी केवल से सर्वाशंतः अब मुक्त होगा राष्ट्र
अब आजाद होंगे नगर, आजाद होंगे गांव
अब आजाद होगी भूमि
आजाद होंगे खेत
अब आजाद होंगे कारखानें
मशीनों पर और श्रम पर, उपज के सब साधनों पर 
सर्वहारा स्वयं अपना करेगा अधिकार स्थापित
दूहकर वह आंत जोंकों की, मिटा देगा की धरा की प्यास
करेगा आरम्भ अपना स्वयं ही इतिहास

ब्राह्मण परिवार में जन्मा बाबा अपने चारों तरफ पसरी सामाजिक कुरीतियों से अकेले ही लोहा लेता रहा। बचपन में मां को खो चुका वैद्यनाथ, युवा अवस्था तक आते-आते सनातनी संस्कृति से छुटकारा पाने के लिए छटपटाने लगा। 
बाबा ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया और नागार्जुन नाम मिला। कई वर्ष बौद्ध मठों में बीताना तथा प्राकृत एव तिब्बती भाषा सीखना, बाबा के लिए नए अनुभव थे। मैथिली, हिन्दी, बांग्ला, संस्कृत, पाली, अर्ध-मागधी अपभ्रंश, सिंहली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, अंग्रेजी आदि भाषाओं पर भी बाबा का अधिकार था।  
फक्कड़पन में जीते हुए बाबा को कोई मोह या बंधन आकृष्ट नहीं कर पाया। हां, सामाजिक विद्रपूताओं ने बाबा को चैन नहीं लेने दिया, तो बाबा ने भी इन विसंगतियों का पीछा नहीं छोड़ा। विद्यालय-व्यवस्था का यथार्थ चित्रण बाबा की कविता कुछ ऐसे करती है-

घुन खाये शहतीरों पर बारहखड़ी विधाता बांचे
फटी भींत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे
बरसा कर बेबस बच्चों पर मिनट-मिनट में पांच तमाचे
इसी तरह दुखहरन मास्टर गढ़ता आदम के सांचे

कविता ‘प्रेत का बयान’ में बाबा ने व्यवस्था पर करारा प्रहार किया-

कैसे मरा तू?
भूख से, अकाल से? बुखार कालाजार से?
पेचिस बदहजमी, प्लेग महामारी से?
कैसे मरा तू, सच-सच बतला!
.........
सावधान महाराज,
नाम नहीं लीजिएगा
हमारे समक्ष फिर कभी भूख का!!
.....
सुनिए महाराज, तनिक भी पीर नहीं
दुःख नहीं, दुविधा नहीं
सरलापूर्वक निकले थे प्राण
सह न सकी आंत जब पेचिस का हमला
.....
सुनकर दहाड़ 
स्वादहीन भारतीय प्राइमरी स्कूल के
भूखमरे स्वाभिमानी सुशिक्षक प्रेत की
रह गए निरुत्तर 
महामहिम नरकेश्वर।

नागार्जुन ने स्वाधीनता संघर्ष और किसान आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। इस दौरान जेल भी गए। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में सक्रियता के कारण बाबा ने जेल का अनुभव फिर से लिया। परंतु जब बाबा को इस आंदोलन की खामियों का ज्ञान हुआ तो ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ जैसी कविता लिख डाली।
माक्र्स की विचारधारा मंे सहमति रखने वाले बाबा, सन् 1962 में चीन आक्रमण के समय कम्युनिस्टों की नीतियों से असहमत होते हुए उनसे दूर हो गए। बाबा आजीवन किसान व मजदूर के साथ खड़े रहे।
आदिवासियों के उजड़े घरोंदे देख बाबा का आहत मन बोल उठा-

देखो न, कारखानों के नाम पर
पिछले दस-पंद्रह साल के अंदर 
हमारे सारे जंगल हमसे
छीन लिए हैं उन लोगों ने
सफेदपोश बाबू लोगों ने
कहीं का न रहने दिया हमें

बाबा को विश्वास था कि आने वाली पीढि़यां शोषण से मुक्त हो जाएंगी, तभी तो वे भावी साम्यता के लिए युवा वर्ग को पुकारते हैं-

आगामी युगों के मुक्ति सैनिक, कहां हो तुम?
निपीडि़त-शोषित मानवता के उद्धारक, कहां हो तुम?
आओ, सामने आओ बेटे!
....
आओ, खेत-मजदूर और भूमिदास नौजवान
आओ, खदान-श्रमिक और फेक्ट्री-वर्कर नौजवान
आओ, कैम्पस के छात्र और फैकल्टियों के नवीन-प्रवीण प्राध्यापक
हां, हां, तुम्हारे ही अंदर तैयार हो रहे हैं
आगामी युगों के लिबरेटर

बाबा ने डरना तो मानो सीखा ही नहीं। सत्ता का सच बयान करने में भी वे नहीं चूके। सत्ता की क्रूरता पर बाबा नागार्जुन लिखते हैं-

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहां-तहां दगने लगी शासन की बंदूक

बदलती परिस्थितियों को हास्य-मिश्रित व्यंग्य में ढालने की दक्षता लिए बाबा मनुष्य के सम्पूर्ण चितेरे बन जाते हैं-

पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया, बाकी रह गए चार
चार पूत भारत माता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गए तीन
तीन पूत भारत माता के लड़ने गए वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी रह गए दो
दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी रह गया एक
एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा
पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा।

‘खादी ने मलमल से सांठगांठ कर डाली.....’ कहकर उच्च वर्ग पर व्यंग्य करने वाले बाबा, उच्च वर्ग एव निम्न वर्ग की तुलना करते हैं-

वे लोहा पीट रहे हैं
तुम मन को पीट रहे हो
वे पत्तर जोड़ रहे हैं
तुम सपने जोड़ रहे हो
उनकी घुटन ठहाकों में घुलती है
और तुम्हारी घुटन,
उनींदी घडि़यों में चुभती है

महाकवि निराला के बाद छंदों की जितनी भिन्नता नागार्जुन में मिलती है, वह अन्य कहीं नहीं। निराला को याद कर बाबा का हृदय श्रद्धा से झुक जाता है। निराला को संबोधित करते हुए बाबा कहते हैं-

मांग रहे हो किससे हिसाब, कैफियत तलब किससे करते हो?
हंसते हो तुम उन मूर्खों पर
जो युग की गति के मुड़ने का स्वप्न देखते!
रोते हो तुम
दीन, दुर्दशाग्रस्त जनों की दुख दुविधा पर!

कवि प्रकृति में स्वजन की आत्मीय छाया महसूस करता है। ओर-छोर फैली यह प्रकृति कवि को लुभाती है। यही कारण है कि बाबा बुंदेलखंडी संस्कृति के चप्पे-चप्पे में केदारनाथ अग्रवाल की झलक महसूस करते हैं। केदारनाथ को संबोधित करते हुए बाबा लिखते हैं-

ओ जन-मन के सजग चितेरे
साथ लगाए हम दोनों ने बांदा के पच्चीसों फेरे...
केन-कूल की काली मिट्टी, वह भी तुम हो!
कालिंजर का चैड़ा सीना, वह भी तुम हो!
ग्रामवधू की दबी हुई कजरारी चितवन, वह भी तुम हो!
कुपित कृषक की टेढ़ी भौंहें, वह भी तुम हो
खड़ी-सुनहली फसलों की छवि-छटा निराली, वह भी तुम हो!

राहुल सांस्कृत्यायन और केदारनाथ अग्रवाल के साथ बाबा के बहुत-करीबी संबंध रहे। बाबा की कविताओं में कहीं-कहीं आत्मकथ्य भी प्रस्फुटित होता है। ‘नेवला’, ‘ओ जन-मन के सजग चितेरे’, ‘शैलेन्द्र के प्रति’, ‘महाकवि निराला’, ‘रवि ठाकुर!’, ‘भारतेन्दु’, ‘कालिदास’ आदि कविताओं मंे बाबा के हृदय पुष्प की पंखुरियां खिली हुई दिखाई देती हैं। इन कविताओं में बाबा भावात्मक तन्मयता में डूबकर जिस भावयोग से सृष्टि करते हैं, वह अद्वितीय है। 
बाबा के आत्मजनों में पत्नी है, शिशु है और एक विचित्र जीव नेवला है। जेल यात्रा के समय नेवला बाबा के कितना करीब आ गया था, इसका आभास कविता में होता है। बाबा का यह नेवला मोतिया नाम से कविता में उतारा-

तू रह-रहकर कहां गुम हो जाता है?
हफ्ता-हफ्ता, दस-दस रोज गायब रहता है!
देख जमूरे, तेरी आवारगी बेहद खलती है हमें....
अखलाक, अखलाक!
ये देखो, मोतिया मेरी गोद में लेटा है
जाने कितना थका है आज!
सारे दिन जाने कहां-कहां के चक्कर लगाता रहा है
अखलाक, लाओ तो प्लेट में खीर
हां, देखना, चार-पांच चम्मच से ज्यादा न डालना!

सन् 1930 में अठारह वर्ष की आयु में अपराजिता से बाबा का विवाह हुआ। फक्कड़पन बाबा का हमेशा सहचर रहा। विवाह के बाद भी जीवन का पूर्व से चला आ रहा घुमक्कड़पन बना रहा। बाबा इस चिर-परिचित फक्कड़ी और मस्ती के बावजूद एक बैचेन कवि हैं। उनकी कविता का प्रस्थान बिंदु इद्रिंयगोचर साक्ष्य है। बाबा कल्पनालोक की यात्रा करने निकलते हैं-

अमल धवल गिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देखा है
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है

लेकिन इस रंगीन दुनिया से टकराकर बाबा का कवि हृदय यथार्थ पर कदम रखता है-

कहां गया धनपति कुबेर वह
कहां गई उसकी वह अलका?
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूंढ़ा बहुत, परंतु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए, वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो, वह कवि कल्पित था-
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है

बाबा की काव्य दृष्टि सदैव एकांकी अकिंचनों पर रही। जो छोटी नाव और बुलंद हौंसलों के साथ सागर पार करने निकले हैं, बाबा उन्हें प्रणाम करते हैं-

जो नहीं हो सके पूर्णकाम
मैं उनको करता हूं प्रणाम!
...जिनकी सेवाएं अतुलनीय
पर विज्ञापन से दूर;
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके 
कर दिए मनोरथ चूर-चूर-
उनको प्रणाम!

बाबा आजादी के दिवानों को भला कैसे भूल सकते थे? उनकी रचनाओं में यथार्थ का स्वर मुखर रहा और इसी मुखरता में वे स्वतंत्रता-सेनानियों का स्मरण करते हैं-

कृत-कृत नहीं हो पाए;
प्रत्युत फांसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल!
उनको प्रणाम!

प्रेम तत्व कवि हृदय का स्थायी तत्व है। जिसके हृदय में प्रेम-सरिता नहीं, वहां से कविता की धाराएं नहीं फूट सकती। पत्नी और बच्चों के लिए उमड़ती पे्रम-स्रोत वाहिनी बाबा के हृदय को आप्लावित करती रही। बाबा का यह स्नेह पत्नी-बच्चों से दूर रहते हुए भी हरपल बना रहा। अपने पुत्र शोभाकांत के प्रति भावविह्वल होकर बाबा लिखते हैं-

धन्य तुम, मां भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क
उंगलियां मां की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जबकि आंखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुस्कान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान।

अपने घुमक्कड़ जीवन में बाबा दो-दो, तीन-तीन वर्ष तक लगातार घर से बाहर रहते। इस बीच बचपन की पगडंडियां याद आती हैं। पत्नी और बच्चों से मिलने को जब मन अधीर हो उठता, तब बाबा काव्य का सहारा कुछ यूं लेते-

घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल!
याद आता है तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल!
कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज?
कौन है वह एक जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज?
चाहिए किसको नहीं सहयोग?
चाहिए किसको नहीं सहवास?
कौन चाहेगा कि उसका शून्य में टकराए यह उच्छ्वास?

स्वजनों के साथ ही बाबा अपने गांव की याद में छटपटाते हैं-

याद आते स्वजन
जिनकी स्नेह से भींगी अमृतमय आंख
स्मृति-विहंगम को कभी थकने न देंगी पांख
याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम
याद आती लीचियां, वे आम
याद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भाग
याद आता धान

प्राकृत और तिब्बती भाषा के गं्रथों की खोज एव शोध के लिए बाबा हिमालय की विकट पगडंडियों पर जब कभी हिम्मत हारने लगते तो पत्नी का स्नेहसिक्त चेहरा याद आता। पत्नी की स्हेहिल छाया को अपने साथ पाते बाबा-

अमृतगर्भा उंगुलियों से घाव भरकर,
मुक्त कर जा मुझे मर्मांतक व्यवस्था से;
सुला जा हजकर हृदय लंबी कथा से;
पलातक ही सही, पर करबद्ध होकर
खड़ा हूं सखी, आंसुओं से आंख धोकर।
आह, यदि इन धुली आंखों में तुम्हारी 
नाचने लग जाए छवि कल्याणकारी,
फिर यहां से और आगे बढ़ सकूंगा;
हिमालय के तुंग शिखर पर चढ़ सकूंगा।

ये विकट पंगडंडिया, ये झूलते पूल, ये भयानक घाटियां, चिर-तुहिन-संकुल,
सामने यह मृत्यु की प्रत्यक्ष छाया, निबट लूंगा सभी से हे योगमाया!
साथ हो केवल मधुर मुस्कान तेरी,
ले सकेगा कौन जग में जान मेरी?
दिवस हो दुर्दिवस, रातें हों अंधेरी,
परिस्थिति हो विषम, तो भी सजनि मेरी-
चाल धीमी कभी यह पड़ने न पाए;
चाहता हूं इसलिए तू याद आए।

स्त्री या पुरुष, जीवन की राहें अकेला शायद ही काट पाए। बाबा ने भी जीवन-साथी को पुकारा-

अकेले ही नाव खेने जा रहा था,
सफलता का श्रेय लेने जा रहा था।
किंतु तेरे बिना, सखि, मधुकोश मेरा
हो चला है रिक्त, यह सब दोष मेरा।
पिला दो जीवन सुधा ...
स्मितमुखी, फिर कर सकूंगा आरंभ यात्रा।
स्वप्न में ही सही, तुम फिर मुस्करा दो, 
अमृत की दो बूंद इस मुंह में गिरा दो!


नागार्जुन के रचना-संसार को साहित्य-समीक्षा के सांचे में ढले मानदण्डों से वर्गीकृत, विश्लेषित करना बहुत कठिन है। एक तरफ संवेदनाओं की गहराई लिए उनकी कविता पाठक को झकझोरती है तो दूसरी तरफ ‘चना जोर गरम’ जैसी बचकाना लगने वाली कविता भी उन्हीं की कलम से निकलती है।
साहस को निचोड़ देने वाले विषयों पर चलने वाली नागार्जुन की लेखनी, कभी-कभी बच्चे की भांति थिरकने लगती है-

धिन-धिन-धा-धमक-धमक
मेघ बजे
दामिनी यह गई दमक
मेघ बजे
दादुर का कंठ खुला
मेघ बजे
धरती का हृदय खुला
मेघ बजे
पंक बना हरिचंदन
मेघ बजे
हल्का है अभिनंदन
मेघ बजे
धन-धिन-धा-धमक-धमक

यही मन तरुण के हृदय का गान भी बन जाता है-

बहुत दिनों के बाद 
अबकी मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिलकंठी तान.....
अबकी मैंने जी भर भोगे
गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब
साथ-साथ इस भू पर 

नागार्जुन लोक-संवेदना के आस्वाद से समृद्ध प्रगतिशील कवि हैं। सतरंगी धरा के सौन्दर्य से बाबा की हर सांस का जितना गहरा संबंध है। उतनी ही गहरी घृणा उस पर व्याप्त विषमताओं से है। हिंसा से आहत बाबा का हृदय हूंकार उठता है-

नव दुर्वासा, शबर पुत्र मैं, शबर-पितामह
सभी रसों को गला-गलाकर 
अभिनव द्रव तैयार करूंगा,
महासिद्ध मैं, मैं नागार्जुन
अष्ट धातुओं से चूरे की छाई में मैं फूंक भरूंगा,
देखोगे, सौ बार मरूंगा
देखोगे, सौ बार जिऊंगा
हिंसा मुझसे थर्राएगी
मैं तो उसका खून पियूंगा...

महात्मा गांधी की हत्य के बाद बाबा की कविता प्रखर हो उठी। इस जघन्य हत्या से बाबा आहत हुए। ‘शपथ’ कविता के माध्यम से उनके आहत मन की अभिव्यक्ति हुई-

महामौन यह, पिता, तुम्हारा
रह-रह मुझे कुरेद रहा है।
इसे न कोई कविता समझे
यह तो पितृ-वियोग-व्यथा है
श्राद्ध-समय में बहे न आंसू
यह तो बड़ी विचित्र प्रथा है
पर न आज रोके रुक पाती
आंखें मेरी, भर-भर आतीं
रोता हूं, लिखता जाता हूं
कवि को बेकाबू पाता हूं

बाबा का लेखन अनूठी सान पर चढ़कर बाहर आता था, जिसे ऐसी धार मिलती, जो मानवीय मन को प्रेम स्पर्श से सींचती है, तो वहीं सामाजिक-राजनीतिक विषमताओं की तरफ पैनी दृष्टि डालती है।
बाबा की भाषा आम पाठक से जुड़ी हुई है, कृषक-संस्कृति के साथ आत्मीयता से जुड़े बाबा के साहित्य में भाषिक मुहावरे ठेठ गांव से उठाए गए हैं। उन्होंने कविता के सारे बंधन तोड़ दिए। एक कविता में कई प्रकार की पदावली, छंद और लय का प्रयोग बाबा ने किया है। उन्होंने छंदबद्ध कविताएं भी लिखी, जिनमें मैदानी नदी का सा संयमित प्रवाह है, तो मुक्त छंद में लिखी कविता में पहाड़ी नदी की सी चंचलता।
बाबा की कविताओं से लगता है कि रचना के लिए बाबा का शैली को नहीं खोजते, बल्कि शैली ही बाबा को खोज लेती है। 
आलोचक डाॅ. रामविलास शर्मा बाबा के विषय में कहते हैं- ‘‘समकालीनता से जुड़ा हुआ ऐसा क्रांतिकारी कवि हिन्दी में दूसरा नहीं है....... नागार्जुन की एक विशेषता यह है कि वे लोक-संस्कृति से जुड़े हुए हैं।’’
बाबा नागार्जुन जन की भाषा में लिखने वाले जन के कवि थे और जन की जुबा पर आज भी उनकी कविताएं थिरकती हैं। बाबा की कलम भी इसको सिद्ध करती है-


जन-जन में जो ऊर्जा भर दे,
मैं उद्गाता हूं उस रवि का।

बाबा नागार्जुन की कलम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कृतसंकल्पित रही। बाबा सन् 1998 में 87 वर्ष की उम्र पाकर विराट में समा गए। उनकी कलम मौन हुई लेकिन शब्द आज भी गुंजायमान हैं और सदियों-सदियों तक भारतवर्ष में दिव्य-संदेश संप्रेषित करते रहेंगे।
बाबा की चिर-परिचित वाणी आज भी हमसे कहती है-

प्रतिबद्ध हूं
संबद्ध हूं
आबद्ध हूं
प्रतिबद्ध हूं, जी हां, प्रतिबद्ध हूं-
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त...
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ...
अविवेकी भीड़ की ‘भेडि़या-धसान’ के खिलाफ....
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए....
संबंद्ध हूं, जी हां, संबद्ध हूं-
सचर-अचर सृष्टि से......
शीत से, ताप से, धूप से, ओस से, हिमपात से......
राग से, द्वेष से, क्रोध से, घृणा से, हर्ष से, शोक से, उमंग से,
आक्रोश से...... 
आबद्ध हूं, जी हां, आबद्ध हूं-
स्वजन-परिजन के प्यार की डोर में....
तीसरी-चैथी पीढि़यों के दंतुरित शिशु सुलभ हास में...
लाख-लाख मुखड़ों के तरुण हुलास में....
आबद्ध हूं, जी हां, आबद्ध हूं। 

बाबा की यही आवाज वर्षों, सदियों, सहस्रशताब्दियों तक गूंजती रहेगी।


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